लालकृष्ण आडवाणी RSS कार्यकर्ता से भारत रत्न बनने की पूरी कहानी और जीवन परिचय

BY MANJEET         03/02/2024

आज हम आपसे परिचय कराएंगे ऐसी शख्सियत का जिसका नाम भारत रत्न के लिए 2 जनवरी 2024 को अनाउंस हो चुका है। लालकृष्ण आडवाणी  का जन्म 1927 में अखंड भारत के कराची में हुआ और सन 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ते हैं, 1947 में भारत को आजादी मिलती है तो अपनी जन्म भूमि को छोड़कर दिल्ली चले जाते हैं। बहुत कम लोग यह जानते होंगे की 1947 से 1951 तक वे राजस्थान के अलवर, भरतपुर, कोटा बूंदी और झालावाड़ में संघ का प्रचार करते रहे और इसके बाद सन 1958 में दिल्ली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांतीय सचिव नियुक्त किए जाते हैं।

लालकृष्ण आडवाणी RSS कार्यकर्ता से भारत रत्न बनने की पूरी कहानी और जीवन परिचय
लालकृष्ण आडवाणी RSS कार्यकर्ता से भारत रत्न बनने की पूरी कहानी और जीवन परिचय

नाम है लालकृष्ण आडवाणी, अप्रैल 2002 के दूसरे सप्ताह में गोवा बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही थी। मीडिया और राजनीतिक हल्कों में इस बात की चर्चा थी कि गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी के भविष्य का फैसला क्या होगा, दिल्ली से उड़े उस विशेष विमान में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के साथ गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी बैठे हुए थे। जहाज में विदेश मंत्री जसवंत सिंह और सूचना मंत्री अरुण चौधरी बताया कि 2 घंटे की यात्रा में शुरुआत में बातचीत गुजरात पर हुई। अटल जी गंभीर मुद्रा में बैठे हुए थे तभी जसवंत सिंह चुप्पी तोड़ते हुए बोलते हैं कि अटल जी आप क्या समझते हैं?

अटल जी ने कहा कम से कम इस्तीफा होकर करते तो अच्छा होता तब लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि अगर नरेंद्र भाई के इस्तीफा देने से गुजरात के हालात सुधरते हैं तो मैं इस्तीफा देने के लिए कहूंगा।  लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस से हालात सुधरेंगे। सभी जानते हैं कि वाजपेई की इच्छा के बावजूद आडवाणी की वजह से नरेंद्र मोदी का मुख्यमंत्री पद उस दिन बच गया। माय कंट्री माय लाइफ में आडवाणी ने लिखा है। 

कि जिन दो बड़े मुद्दे पर वाजपेई और मुझ में एक राय नहीं थी उसमे पहला अयोध्या का मुद्दा था जिसमें आखिर में वाजपेई ने पार्टी की राय को माना और दूसरा मामला था गुजरात दंगों पर नरेंद्र मोदी के इस्तीफा की मांग का। गोधरा में बड़ी तादाद में कार सेवकों के मारे जाने के बाद गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हो गए थे। इसके बाद अन्य पार्टियों ने मोदी के लिए दबाव बना दिया था कि नरेंद्र मोदी को इस्तीफा देने के लिए कहा जाना चाहिए। लेकिन मेरी यानी कि आडवाणी जी की राय उस से बिल्कुल अलग थी।

अब इससे करीब 18 साल पहले चलते हैं, जब 1984 के चुनाव में बीजेपी की करारी हार के बाद राष्ट्रीय स्वयं संघ की तरफ से नरेंद्र मोदी को बीजेपी में भेजा गया था और आडवाणी ने मोदी को गुजरात में काम की जिम्मेदारी सौंपी थी। उन्हे पार्टी का महासचिव बनाया गया था। उन्हे आडवाणी के राम रथ यात्रा की गुजरात की जिम्मेदारी भी नरेंद्र मोदी के पास ही रही थी। रथ यात्रा को पूरे देश में भारी समर्थन मिल रहा था,

बिहार में लालू यादव की सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया लेकिन 6 दिसंबर सन 1992 को अयोध्या में कार सेवकों को मस्जिद तोड़ने से रोकने की अपील कर रहे थे और मस्जिद गिरने के बाद दुख जताया था। इस मामले पर उनके खिलाफ एफआईआर भी कर दी थी। आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच वर्षों वर्ष तक गुरु शिष्य जैसा रिश्ता बना रहा। मोदी भी आडवाणी को गुजरात से लगातार सांसद बनाकर भेजते रहे और वाजपेई की तमाम नाराजगी के बावजूद मोदी आडवाणी के विशेष स्नेह पाते रहे। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है

जनसंघ से लेकर बीजेपी तक के सफर में आडवाणी से ज्यादा योगदान किसी का नहीं रहा है। बीजेपी की दूसरी पीढ़ी यानी जो आज सरकार में बैठे हैं उनमें 90% से ज्यादा लोग आडवाणी की देन माने जाते हैं। सन 1984 में बीजेपी की करारी हार के बाद 1986 में सरकार बनने तक में आडवाणी के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राम मंदिर आंदोलन के दौरान देश में सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता होने और संघ परिवार का पूरा आशीर्वाद होने के बावजूद आडवाणी ने सन 1995 में वाजपेई को प्रधानमंत्री पद का दावेदार का ऐलान करके सबको हैरानी में डाल दिया था।

उस वक्त वह पीएम बन सकते थे लेकिन आडवाणी ने कहा कि मैं बीजेपी में वाजपेई से बड़ा नेता कोई नहीं देखता हूं। 50 साल तक वे वाजपेई के साथ नंबर दो पर बने रहे। इतने लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद आडवाणी पर कोई दाग नहीं था।हवाला कांड में  सबसे पहले इस्तीफा देकर आडवाणी ने कहा कि वह इस मामले में बेदाग है और सन 1994 के चुनाव के बाद में मामले में बरी  हो गए ऐसी हिम्मत दिखाना सबके बस की बात नहीं है।  

आडवाणी जी का जन्म और स्थान

लाल कृष्ण आडवाणी का जन्म कराची सिंध परिवार में 8 नवंबर सन 1927 में हुआ था। उनके पिताजी एक व्यापारी थे। उनके पिता का नाम श्री किशनचंद आडवाणी था और इनकी माता का नाम श्रीमति ज्ञानी देवी था। यह परिवार भारत के राज्य कराची जो की अब  पाकिस्तान में है उसका हिस्सा हुआ करते थे। कराची में रहने के बाद भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में यह परिवार पाकिस्तान से मुंबई भारत में आ गए थे।

लालकृष्ण आडवाणी की स्कूली शिक्षा सेंट पेट्रीक हाई स्कूल कराची से हुई। फिर उन्होंने हैदराबाद के केके डीजी कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की। पाकिस्तान से भारत आने पर गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से अपनी वकालत की पढ़ाई की।

लालकृष्ण आडवाणी जी का वैवाहिक जीवन 

सन 1965 में फरवरी में लालकृष्ण आडवाणी का विवाह कमला देवी से हुआ। इस दंपति की दो संताने हैं। उनके पुत्र का नाम जयंत आडवाणी तथा पुत्री का नाम प्रतिभा आडवाणी है। प्रतिभा आडवाणी टीवी सीरियल निर्माता होने के साथ-साथ अपने पिता श्रीलाल कृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन में भी उनके सहयोगी रही है। इनकी पत्नी का अचानक अप्रैल 2016 में  हार्ट अटैक से निधन हो गया था।

लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक जीवन 

 लालकृष्ण आडवाणी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत सन 1942 में आरएसएस में शामिल होके की थी। आरएसएस एक हिंदू सांस्कृतिक संगठन है। आडवाणी सबसे पहले कराची पाकिस्तान में ही आरएसएस के प्रचारक हुए और आरएसएस को अपनी सेवाएं देते हुए उन्होंने आरएसएस की कई शाखाएं स्थापित की।  भारत पाकिस्तान के बंटवारे के बाद भारत आने पर उन्हें राजस्थान के अलवर भेजा गया। इसके बाद इन्होंने भरतपुर कोटा जिले में काम किया।

सन 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आरएसएस के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ की स्थापना की।   सप्ताह पत्रिका में उन्होंने संपादक का भी कार्य किया। कुछ समय बाद अटल बिहारी वाजपेई को भारतीय जनता पार्टी के सबसे पहले अध्यक्ष पद पर चुना गया। अटल जी की अध्यक्षता में पार्टी में हिंदुत्व की भावना अत्यधिक रूप से प्रचलित हुई।

1984 में बीजेपी सरकार को सत्ता गवानी पड़ी।  सन 1984 के चुनाव के कुछ समय पश्चात इंदिरा गांधी की अचानक हत्या के बाद सभी वोट कांग्रेस को मिले और बीजेपी को सिर्फ दो लोकसभा सीटों से ही संतोष करना पड़ा।  इसके बाद अटल जी को अध्यक्ष पद से हटाकर लाल कृष्ण आडवाणी को अध्यक्ष घोषित कर दिया गया। 

लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राम जन्मभूमि मुद्दा 

लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने राम जन्मभूमि का मुद्दा उठाया और आज भी भाजपा का राजनीतिक मुद्दा राम मंदिर निर्माण ही है जो अब पूरा भी हो चुका हैं। भाजपा नेताओं का मानना यह था कि अयोध्या में श्री राम की जन्म भूमि है यहां स्थित बाबरी मस्जिद के पहले राम मंदिर ही था, परंतु मुगल शासक बाबर ने उस मंदिर को तुड़वा कर राम मंदिर की जगह मस्जिद का निर्माण करवाया है और इसी के विरोध में सभी हिंदू तथा भाजपा नेता मस्जिद की जगह राम मंदिर बनवाना चाहते थे।

  इसी मुद्दे को भाजपा ने चुनावी एजेंडा बनाया और इसका फायदा उठाया। 1989 के चुनाव के दौरान कांग्रेस को बहुमत मिलने पर भी उसने केंद्र में सरकार बनाने से इनकार कर दिया था इसलिए बीपी सिंह की सरकार को भाजपा ने अपना 86 सीटों का समर्थन देकर नेशनल फ्रंट सरकार बनाने में मदद की। लालकृष्ण आडवाणी दिग्गज तथा दूरदर्शी नेता थे, फिर भी राजनीति में रहते हुए उन पर कई आरोप लगे। उन पर हवाला  ब्रोकर से रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सबूत के अभाव में कर दिया गया। 2004 के चुनावों के बाद भाजपा की सत्ता देखी जा रही थी। 

लालकृष्ण आडवाणी जी के जीवन में राजनीतिक उतार चढ़ाव 

इस पर लालकृष्ण आडवाणी  ने दावा किया कि कांग्रेस की पार्टी चुनाव में 100 से अधिक सीटें नहीं ला पाएगी। लेकिन हुआ कुछ और ही भाजपा की हार हुई और उसे लोकसभा में विपक्ष में बैठना पड़ा। केंद्र में कांग्रेस की सरकार आई और डॉक्टर मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेते हैं। लालकृष्ण आडवाणी जी की आलोचना का दौर यहीं खत्म नहीं होता है। एक बार ये 2005 में कराची गए  जो कि उनका जन्म स्थान है।

वहां उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को एक धर्मनिरपेक्ष नेता बताया। यह बात आरएसएस के हिंदू नेताओं को गले नहीं उतरी।आरएसएस के नेताओं ने इस बयान के विरोध में लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफे की मांग की। और तमाम क्रियाकलाप के बाद आडवाणी को विपक्ष के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा।  लेकिन बाद में उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया।  2004 से 2009 तक अध्यक्ष पर रहते हुए 2006 में एक न्यूज़ चैनल को इंटरव्यू में अपने खुद को 2009 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार बताया था।

इसका मुख्य कारण था कि वह भाजपा के वरिष्ठ और अनुभवी नेता थे। प्रधानमंत्री पद के लिए प्राकृतिक रूप से दावेदार है । इसी कड़ी में दिसंबर 2007  में अगले चुनाव के लिए भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के लिएअपना दावेदार घोषित कर दिया था लेकिन शायद लाल कृष्ण आडवाणी की किस्मत में प्रधानमंत्री बनना लिखा ही नहीं था।  2009 में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार केंद्र में आई और  डॉक्टर मनमोहन सिंह ने दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्म से ले कर मृत्यु का जीवन सफर

2009 के चुनाव हारने के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी के दूसरे नेताओं के लिए रास्ता साफ किया और पार्टी में ज्यादा सक्रिय नहीं हुए। 2009 में सुषमा स्वराज भाजपा की ओर से लोकसभा अध्यक्ष के रूप में चुनी गई।  2014 के चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी की सभी मूल्य में प्रबल दावेदारी और भागीदारी रही। इस पर लालकृष्ण आडवाणी ने नाराजगी जताते हुए भाजपा पर आरोप लगाया कि  यह पार्टी श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी द्वारा बनाई गई पहले वाली भाजपा पार्टी नहीं रह गई है।

नाराज होकर आडवाणी जी ने अपना इस्तीफा भी पार्टी को भेज दिया लेकिन भाजपा के वरिष्ठ समिति ने इस्तीफा ना  मंजूर कर दिया। बीजेपी अध्यक्ष पार्टी में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।  पार्टी को हमेशा उनकी आवश्यकता रहेगी।  2014 में एलके आडवाणी को भाजपा संसदीय बोर्ड से निकालकर बीजेपी के मार्गदर्शन मंडल में डाल दिया गया।  इस मंडल में आधुनिक के साथ-साथ कहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेई के साथ-साथ मुरली मनोहर जोशी भी शामिल थे।

राजनीतिक सफर को माय कंट्री माय लाइफ पुस्तक के जरिए दुनिया को बताया है। इस किताब का भारत के 11वें राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा इस का विमोचन 2008 में किया गया था। इस किताब में कुल मिलाकर के 1040 पेज है। जो कि आडवाणी के जीवन की घटनाओं को चित्रित करते हैं। यह किताब अधिक बिकने वाले किताब रहिए उन्होंने पार्टी के लिए हमेशा अपने अनुभव का योगदान दिया है। 

लाल कृष्ण आडवाणी जी को पदम श्री पुरस्कार

उनका भाजपा के प्रति किया गया समर्पण ही आज भाजपा को यह तक लाया है। उन्हें 2015 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। भाजपा उनके अनुभव का लाभ लेती रहेगी अपनी दीर्घायु और स्वास्थ्य के कारण राजनीतिक से यात्रा को विराम दे चुके हैं। लेकिन भारत के लोकतंत्र की बात की जाएगी तो भारत में अटल बिहारी वाजपेई और लाल कृष्ण आडवाणी का नाम विपक्ष के रूप में जरूर लिया आएगा। भारत रत्न देने की घोषणा लालकृष्ण आडवाणी जी को 2 फरवरी 2024 को की गई थी।

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