जानिए कैसे Smartphon कंपनी अपने जाल में आपको फ़सती हैं साथ ही पृथ्वी को भी दूषित करती है

BY MANJEET             24/04/2024

Smartphon :  इस छोटे से डिवाइस में मानो आज पूरी दुनिया समा गई है। इसी से हम जानकारी पाते हैं। इसी के जरिए लोगों से और दुनिया से जुडते हैं। आज तो इसी के जरिए हम अपना मनोरंजन भी करते हैं। अगर इसकी कमियां गिननें बैठे तो वह क्या है हां, यह हमारा बहुत सारा समय खाता है,यह हमें असल दुनिया से काटता है,और कई बार तो इसकी वजह से डिप्रेशन जैसी बीमारियां भी होने लगते हैं।  क्या कमियां है,Smartphon और ऐसे दूसरे गैजेट्स हमारे पर्यावरण पर भी भारी पड़ते हैं।

जानिए कैसे Smartphon कंपनी अपने जाल  में आपको फ़सती हैं साथ ही पृथ्वी को भी दूषित करती है
जानिए कैसे Smartphon कंपनी अपने जाल में आपको फ़सती हैं साथ ही पृथ्वी को भी दूषित करती है

क्योंकि उनकी वजह से इलेक्ट्रॉनिक कचरा यानी कि वेस्ट पैदा होता है। क्योंकि हम नए-नए गैजेट्स खरीदे जा रहे हैं। थोड़े से भी पुराने पड़े अपने गैजेट्स फेंक रहे हैं। कभी आपने अपना टूटा Smartphon ठीक कराया है। या उसकी जगह फटाफट नया फोन खरीद लिया फोन को रिपेयर करना मुश्किल है। यही दिक्कत है। दुनिया भर में हर साल 5 करोड़ मेट्रिक टन ई वेस्ट यानी इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। यह हर सेकंड 1000 लैपटॉप कचरे में फेंकने के बराबर है।

 रिपेयर करना मुश्किल और कंपनियां महंगे पार्ट्स बना रही है। यह तरीका बिल्कुल सस्टेनेबल नहीं है। इसके पीछे Smartphon बनाने वाली कंपनियां है। लेकिन हम अपने फोन की बैटरी आसानी से क्यों नहीं बदल सकते क्योंकि फोन बनाने वाली कंपनियां ऐसा नहीं चाहती, और बात ही नहीं रुकती 2,3 साल बाद ज्यादातर कंपनी उसकी सिक्योरिटी और सॉफ्टवेयर अपडेट में आपकी ज्यादा मदद नहीं करती पुराने पड़ चुके सॉफ्टवेयर में कोई सर नहीं खपाता  ऐसा जानबूझकर किया जाता है।

Smartphon कंपनियां क्या चाहती है 

 कंपनियां चाहती है कि, आप नए-नए स्मार्टफोन खरीदते रहे जाहिर है, इसी से Smartphon बनाने वाली कंपनी की कमाई होती है। स्मार्टफोन में आई  छोटी सी खराबी को ठीक करना भी बड़ा काम है। किसी रजिस्टर्ड स्टोर से ठीक करेंगे तो बहुत खर्चा होगा क्योंकि कंपनियां फोन की रिपेयरिंग पर भी कमाती है। एप्पल का नया आईफोन 15 इस बात की बढ़िया मिसाल है कि, कैसे फोन में आई खराबी को ठीक करना मुश्किल और महंगा सौदा है।  

इसमें सॉफ्टवेयर लॉक है,अगर आपने किसी पार्ट की जगह कोई नया पार्ट लगाया है। वह एप्पल का नहीं है, तो फोन के सिस्टम को पता चल जाता है। फिर फोन वार्निंग मैसेज दिखने लगता है।  या फिर चलना ही बंद हो सकता है।  एप्पल का कहना है कि, वह यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि, उनका डिवाइस ठीक से काम करता रहे लेकिन असल में तो यह अपने महंगे स्पेयर पार्ट्स बेचने का तरीका है।  इतनी आफत से बचने के लिए लोग अक्सर नया फोन ही खरीद लेते हैं।  

इसका मतलब है कि, ज्यादा Smartphon बनते हैं। दुनिया भर में वह भेजे जाते हैं। उनके लिए ज्यादा खनन होता है,और संसाधनों की बर्बादी होती है। इससे कार्बन उत्सर्जन और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का अंबार बदता है। ई-वेस्ट इलेक्ट्रॉनिक्स में बहुत से तत्व होते हैं।  जैसे कि कैडमियम, लेट, मरकरी,और डायोपिन, साथ ही सोना ,और दुर्लभ तक तुम जैसी कीमती धातु, में भी होती हैं। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में 2022 में 530 करोड़ मोबाइल फोन कचरे में फेंक दिए गए अमेरिका में तो लोग औसतन डेढ़ साल में अपना फोन बदल देते हैं। 

भारत में भी ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आपने भी अपने आसपास कुछ लोगों को देखा होगा जिन पर हमेशा नए-नए फोन खरीदने का जुनून सवार रहता है। अगर ऐसा ही चला रहा तो वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि, 2050 तक दुनिया भर में सालाना की कचरा दोगुना होकर 12 करोड़ तान के आसपास पहुंच सकता है।  जहां तक भारत की बात है, तो वित्त वर्ष 2021-22 में कुल की वेस्ट 16 लाख तन से ज्यादा रहा इसकी वजह है। 

इसकी वजह नए-नए  गैजेट्स को लेकर हमारा लालच अगर उसे हमने नहीं संभाला तो की कचरे का यह पहाड़ बढ़ता ही जाएगा। नए गैजेट खरीदने से पहले पुराने की कोठी करने की कोशिश की जाए तो पर्यावरण कम दूषित होगा। पहले भी बहुत कोशिश की गई है कि, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजॉन, जैसी कंपनियों को सस्टेनेबल प्रोडक्ट बनाने के लिए राजी किया जाए लेकिन बड़ी टैग कंपनियों ने तो सांसदों पर लाखों डॉलर खर्च कर दिए ताकि वह रिपेयरिंग से जुड़े कानून का समर्थन न करें कंपनियां रिपेयरिंग के विरोध में बहुत से कारण गिनवाती है। 

पहले वह कहती है की, रिपेयरिंग के अधिकार से उनकी बौद्धिक संपदा के अधिकार का हनन होगा उनकी दूसरी चिंता है। ग्राहकों की सुरक्षा क्या होगा अगर डिवाइस को ठीक करते हुए लोगों को चोट लग जाए कंपनियां यह भी दावा की रिपेयरिंग से हैकिंग जैसी समस्या भी बढ़ सकती है।  आखिरी दलील है,घटिया रिपेयरिंग से कंपनी की रेपुटेशन खराब हो सकती है।  रिपेयरिंग के अधिकार के समर्थक इन दलीलों को भी बुनियाद मानते हैं। वह कहते हैं कि, कंपनियों को बस इस बात की चिंता है की, रिपेयरिंग से उनकी कमाई कम हो जाएगी बड़ी कंपनियों की बड़ी पहुंच के बावजूद सरकारों ने कुछ कदम उठाए हैं। 

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Smartphon कंपनी को लेकर कहां बनेगा

यूरोपीय संसद ने हाल में राइट टू रिपेयर यानी रिपेयरिंग के अधिकार को हरी झंडी दी। नए कानून के तहत विक्रेता और निर्माता कंपनी को वारंटी की अवधि में फ्री रिपेयरिंग की सुविधा देनी होगी। अमेरिकी राज्य कैलिफोर्निया में भी इलेक्ट्रॉनिक्स राइट टू रिपेयर एक्ट पास हो चुका है। इसके तहत हर किसी को डिवाइस रिपेयर करने के लिए पार्ट्स टूल्स,और जरूरी मैन्युअल उपलब्ध करने होंगे। इसका मकसद है कि, कचरा और कार्बन उत्सर्जन घाटे। यह कोशिश दमदार लगते हैं, लेकिन बड़ी कंपनियों से उनके सस्टेनेबल बिजनेस के तौर तरीकों को खत्म करना इतना आसान नहीं है। अगर आप अपने खराब फोन को ठीक करना चाहते हैं। तो आई डॉट fix.com वेबसाइट आपकी मदद कर सकती है। 

आप अपनी बताइए परेशानी से बचने के लिए आप भी नया गैजेट खरीदने की हिमायती है।  या पुरानी को रिपेयर करने के कंपनियों को तो अपना कारोबार बढ़ता है। इसलिए वह नए-नए लैपटॉप, Smartphon वीडियो गेम्स टैबलेट और भी न जाने क्या-क्या लाती रहेगी। आपको ललचाती रहेगी लेकिन यह लालच आपकी जेब पर भी भारी पड़ रहा है।  पर्यावरण के लिए भी खतरे बढ़ा रहा है। क्योंकि आमतौर पर नया डिवाइस खरीदने के बाद पुराना कचरे में ही जाता है। इससे ई-वेस्ट बढ़ता चला जाता है। 

तो समाधान क्या है समाधान यही है कि, अपने डिवाइस को भरपूर इस्तेमाल कीजिए और अगर वह खराब हो जाए तो नया खरीदने से पहले यह एक बार जरूर कोशिश कीजिए कि, क्या उसे ठीक कराया जा सकता है।  अपने पर्यावरण की हिफाजत के लिए हमें इतना तो करना ही होगा। 

डिस्क्लेमर : यह सारी जानकारी DW हिंदी चैनल से ली गई है। इसमें हमारा कोई दवा नहीं है।

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